हमास हमले का हिसाब देंगे नेतन्याहू या फिर मिलेगी जीत:ईरान से सुरक्षा, सेना भर्ती में भेदभाव मुद्दा; 19 साल की सत्ता पर फैसला

24 अक्टूबर की रात, इजराइल में तेल अवीव की सड़कों पर लाखों लोग जुटे। उनकी मांग थी कि देश की सत्ता में बदलाव हो। 7 अक्टूबर 2023 को देश पर हुए हमास के हमलों का हिसाब हो, जिसमें 1200 से ज्यादा लोग मारे गए थे। सेना में सर्विस का बोझ सबका हो, किसी खास समाज को छूट न मिले। ये सब चुनाव से तीन दिन पहले हुआ।

इजराइल में आज, 27 अक्टूबर को वोटिंग है। चुनाव में करीब 19 साल प्रधानमंत्री रह चुके बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता पर फैसला होना है। उनके प्रधानमंत्री रहते इजराइली सेना बीते तीन साल में ईरान, गाजा, लेबनान में जंग लड़ चुकी है। इस बार वोटरों के मन में सवाल है कि इजराइली लोगों की सुरक्षा में हुई चूक की जिम्मेदारी कौन लेगा? ईरान जैसी चुनौतियों से कैसे निपटा जाएगा?

24 अक्टूबर को तेल अवीव में सड़कों लोगों की मांग थी कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों और उनसे पहले की घटनाओं की जांच के लिए स्वतंत्र आयोग बनाया जाए।

24 अक्टूबर को तेल अवीव में सड़कों लोगों की मांग थी कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों और उनसे पहले की घटनाओं की जांच के लिए स्वतंत्र आयोग बनाया जाए।

इजराइल में चुनाव का माहौल: पोस्टर-बैनर गायब, पहले जैसा प्रचार नहीं

इजराइल में इस बार भारत की तरह चुनावी प्रचार या रैलियां नहीं हैं। ज्यादातर प्रचार सोशल मीडिया पर है। हालांकि, चुनावी शोर कम दिखने का मतलब ये नहीं कि लोगों के पास मुद्दे नहीं हैं। हम लोगों का मूड समझने तेल अवीव से सटे पेटाह टिकवा शहर पहुंचे। 2.72 लाख आबादी वाले पेटाह टिकवा में 2022 के चुनाव में नेतन्याहू की पार्टी लिकुड को 28% वोट मिले थे।

हम यहां सुबह के वक्त पहुंचे। लोग दुकानों पर आ-जा रहे थे, लेकिन कहीं चुनावी पोस्टर-बैनर नजर नहीं आए। एक दुकानदार ने बताया कि पहले बैनर दिखते थे, इस बार वैसा प्रचार नहीं हो रहा। लोग भी अपनी राजनीतिक पसंद बताने से बचते हैं।

यहीं मिली शेली बोल्कोविच के लिए देश की सुरक्षा के साथ घर का बजट भी चुनाव का बड़ा मुद्दा है। वे कहती हैं कि पिछले कुछ साल में जरूरत की चीजों से लेकर पब्लिक ट्रांसपोर्ट तक सब महंगा हुआ है। मैं ऐसी पार्टी को वोट देना चाहती हूं, जिसके पास अर्थव्यवस्था सुधारने और आम लोगों की जिंदगी आसान बनाने की योजना हो। साथ ही पार्टियां बताएं कि ईरान जैसी चुनौतियों से कैसे निपटेंगी।

शैली अब्राहम की उम्मीद- भारत से रिश्ते मजबूत होंगे

25 साल से इजराइल में रह रहीं शैली अब्राहम को भारत और इजराइल के रिश्तों को लेकर नई सरकार से बड़ी उम्मीद है। वे कहती हैं कि भारत से बहुत से लोग इजराइल में काम करने आते हैं। आने वाली सरकार इन लोगों के साथ सहयोग जारी रखे और दोनों देशों के संबंध मजबूत करे। हालांकि, वे किसी खास पार्टी का समर्थन नहीं करतीं।

लॉरेन बोलीं- नेतन्याहू का काम अच्छा, लेकिन नई दिशा चाहिए

लॉरेन डागन अमॉस नेतन्याहू की तारीफ करती हैं, लेकिन बदलाव भी चाहती हैं। वह कहती हैं कि नेतन्याहू ने देश के लिए काफी काम किया है। फिर भी अब ऐसी सरकार की जरूरत है, जो लोगों को नई उम्मीद और भविष्य की दिशा दे। पड़ोसी देशों और बाकी दुनिया के साथ बेहतर संबंध बनाए।

120 में 61 सीटों का गणित; अरब पार्टियां अहम

चुनाव में तीन धड़े हैं। नेतन्याहू का गठबंधन, विपक्षी गठबंधन और अरब पार्टियां। सर्वे में नेतन्याहू और विपक्षी गठबंधन के बीच कड़ा मुकाबला दिख रहा है। दोनों गठबंधनों के लिए जरूरी 61 सीटें जीतना मुश्किल है, जिससे छोटे दल और अरब पार्टियां किंगमेकर की भूमिका निभा सकती हैं।

चुनाव से पहले चैनल 13 के एक सर्वे में नेतन्याहू विरोधी दलों को 54, नेतन्याहू समर्थक दलों को 50 और अरब पार्टियों को 16 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया। सर्वे में दोनों प्रमुख गठबंधन बहुमत से पीछे हैं। हालांकि, ये अनुमान हैं, नतीजे नहीं। ऐसी स्थिति बनी तो अरब पार्टियों और छोटे दलों की अहमियत बढ़ेगी।

इजराइल की आबादी में अरब नागरिकों की हिस्सेदारी करीब 18% है। उनकी राजनीतिक ताकत इस पर निर्भर करती है कि उनकी पार्टियां कितनी एकजुट होकर चुनाव लड़ती हैं और उन्हें कितने वोट मिलते हैं।

अगर नेतन्याहू का गठबंधन या उनका विरोधी खेमा अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाता, तो अरब पार्टियों का समर्थन निर्णायक हो सकता है। मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली यूनाइटेड अरब लिस्ट यानी राम पहले भी नेतन्याहू विरोधी सरकार को बाहर से समर्थन दे चुकी है।

इजराइल में किसी पार्टी को संसद में प्रतिनिधित्व हासिल करने के लिए कम से कम 3.25% वोट हासिल करने होते हैं। इसे थ्रेशोल्ड कहते हैं। अगर कोई पार्टी इससे नीचे रह जाती है, तो उसे मिले वोट संसद में सीटों में नहीं बदलते। इसका असर पूरे चुनावी समीकरण पर पड़ सकता है।

26 अक्टूबर को इजराइली वोटर सैन फ्रांसिस्को से इजराइल के लोद शहर पहुंचे। ये लोग ‘सेविंग इजराइल डेमोक्रेसी’ लिखा बैनर लिए हुए थे।

26 अक्टूबर को इजराइली वोटर सैन फ्रांसिस्को से इजराइल के लोद शहर पहुंचे। ये लोग ‘सेविंग इजराइल डेमोक्रेसी’ लिखा बैनर लिए हुए थे।

7 अक्टूबर की सुरक्षा चूक, नेतन्याहू का पीछा नहीं छोड़ रही

इजराइल में लंबे समय से रह रहे वरिष्ठ पत्रकार हरिंदर मिश्रा नेतन्याहू की चुनौतियां बताते हैं। कहते हैं, ‘नेतन्याहू के समर्थक युद्ध के दौरान लिए उनके फैसलों का हवाला देकर माहौल बना रहे हैं। वहीं, विरोधी पूछते हैं कि हमले के समय सुरक्षा व्यवस्था क्यों नाकाम रही। इसलिए युद्ध का असर सभी मतदाताओं पर एक जैसा मान लेना ठीक नहीं होगा।

हमास के आतंकियों ने 7 अक्टूबर, 2023 को इजराइल पर हमला किया था। फोटो किबुत्ज कफर अज्जा शहर की है। यहां से आतंकी इजराइली नागरिकों को किडनैप कर ले गए थे। हमले के दौरान 251 लोगों को बंधक बनाया गया था। 1200 लोग मारे गए थे।

हमास के आतंकियों ने 7 अक्टूबर, 2023 को इजराइल पर हमला किया था। फोटो किबुत्ज कफर अज्जा शहर की है। यहां से आतंकी इजराइली नागरिकों को किडनैप कर ले गए थे। हमले के दौरान 251 लोगों को बंधक बनाया गया था। 1200 लोग मारे गए थे।

हरिंदर मिश्रा के मुताबिक, नेतन्याहू की चुनौती सिर्फ विपक्ष से मुकाबला करना नहीं है। उन्हें अपने समर्थकों और सहयोगी दलों को भी साथ रखना है। सेना में सेवा की जिम्मेदारी बड़ा मुद्दा है।

इजराइल में 18 साल की उम्र पूरी होने के बाद सभी को सेना में सर्विस देना अनिवार्य है। अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदी धार्मिक छात्रों को लंबे समय से इसमें छूट मिलती रही है। इजराइल की आबादी में अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदियों की हिस्सेदारी करीब 10% है। उन्हें मिलने वाली छूट पर विवाद है।

हमास से युद्ध के बाद पूछा जाने लगा कि सेना में सर्विस का बोझ समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच कैसे बांटा जाए। यह मुद्दा नेतन्याहू के लिए इसलिए भी अहम है, क्योंकि उनकी सरकार को अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स पार्टियों जैसे यूनाइटेड टोरा जूडाइज्म और शास का समर्थन मिलता रहा है।

विपक्ष के पास मौका, लेकिन नेतन्याहू के खिलाफ माहौल बहुमत की गारंटी नहीं

नेतन्याहू के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट हैं। वे PM पद के सबसे बड़े दावेदार हैं। उन्होंने एक साल पहले ही नई पार्टी बनाई थी। 41 साल सेना में रहे आइजेनकोट इजराइल के आर्मी चीफ रहे हैं। गाजा की जंग शुरू होने के 2 महीने बाद ही उनके बेटे की मौत हो गई थी। आइजेनकोट मिराजी समुदाय से हैं, जो यहूदियों में सबसे ताकतवर है।

हरिंदर मिश्रा गादी आइजेनकोट की छवि को अहम मानते हैं। उनका सेना का अनुभव और सेना में समान जिम्मेदारी पर रुख मतदाताओं को पसंद आ सकता है। मिश्रा के मुताबिक, नेतन्याहू से नाराज मतदाताओं को अपने पक्ष में लाना विपक्ष के लिए पहला कदम है। उसके बाद अलग-अलग दलों को सरकार बनाने के लिए एक साथ रखना होगा। नेतन्याहू के खिलाफ नाराजगी अपने आप विपक्ष के लिए बहुमत की गारंटी नहीं है।

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