
कॉकरोच जनता पार्टी के सौरव दास और आशुतोष रांका को 5 दिन के लिए तिहाड़ जेल भेज दिया गया है। समर्थन में उतरे राहुल गांधी ने कहा कि जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराना अपराध नहीं है। युवाओं को जेल भेजना कायरता है। सारे प्रोटेस्ट एक हैं, अलग-अलग बैनर हैं, लेकिन मुद्दा एक है। हालांकि अपनी पोस्ट में राहुल ने CJP नेताओं या उनके लीडर्स का नाम तक नहीं लिया।
तो क्या CJP और कांग्रेस में अंदरखाने कोई होड़ चल रही, अगर हां, तो इसमें अब तक आगे कौन है और क्या दोनों साथ आ सकते हैं; जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: क्या वाकई CJP और राहुल गांधी में प्रोटेस्ट का क्रेडिट लेने की होड़ है? जवाब: दो संकेतों से समझिए-
10 अक्टूबर को CJP ने प्रोटेस्ट बुलाया, राहुल शामिल नहीं हुए
- 3 अक्टूबर को CJP ने मुंबई में रैली के बाद कहा कि अगर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते, तो 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट शुरू होगा। CJP की लीगल सेल हेड रत्ना सिंह ने कहा, ‘अगर कांग्रेस प्रदर्शनों में शामिल होना चाहे, तो उसका स्वागत है। सिर्फ कांग्रेस नहीं, बल्कि अन्य दल भी। सभी को एक साथ आना चाहिए।’
- ‘वोट-चोरी’ मुद्दे पर आक्रामक राहुल गांधी या कांग्रेस 10 अक्टूबर के प्रोटेस्ट में शामिल नहीं हुए। राहुल ने उस दिन चेन्नई में ‘छात्रों की गूंज’ इवेंट किया। ये कार्यक्रम पहले से तय था, लेकिन सवाल उठे कि केरल के पूर्व सीएम पिनाराई विजयन जैसे नेता, जब आंदोलन के समर्थन में हिरासत में लिए जा रहे हैं, तो राहुल उस प्रोटेस्ट से दूर क्यों हैं।
- राहुल ने शाम को एक वीडियो जारी कर युवाओं से प्रोटेस्ट जारी रखने की अपील की और कहा कि वो उनके साथ खड़े हैं। हालांकि CJP या उसके किसी नेता का नाम नहीं लिया।

प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबरें आईं, तो राहुल ने वीडियो जारी करके युवाओं से प्रोटेस्ट जारी रखने की अपील की।
12 अक्टूबर को राहुल ने मार्च बुलाया, CJP नेता दूर रहे
- राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च की कॉल दी। उन्होंने सभी दलों और समुदायों से इसमें आने की अपील की। कहा कि इस मार्च से राजनीतिक दलों, लिंग, जाति, समुदाय और राज्य की परवाह किए बिना लोगों एकजुट होंगे।
- मार्च से पहले कांग्रेस मुख्यालय में राहुल से CJP को लेकर सवाल किया गया। इस पर उन्होंने कहा, ‘कोई पैरलल प्रोटेस्ट नहीं है। एक ही प्रोटेस्ट है- ज्ञानेश कुमार को इस्तीफा देना होगा।’
- हालांकि CJP की तरफ से कोई भी इस मार्च में शामिल नहीं हुआ। जबकि सौरव दास और आशुतोष रांका दिल्ली में ही मौजूद थे।
ये होड़ जून-जुलाई में भी दिखी थी, जब धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रोटेस्ट हुए थे। भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक ने राहुल से जंतर-मंतर आने का आग्रह किया, लेकिन वह नहीं पहुंचे। फिर 20 जुलाई को जब CJP के संसद मार्च के दौरान ‘पुलिस एक्शन’ हुआ और पूरे देश में प्रोटेस्ट की चर्चा होने लगी, तो राहुल भी एक्टिव हुए। अगले ही दिन घायल छात्रों से मिलने अस्पताल पहुंचे। अचानक पीएम आवास के बाहर धरना देकर सबको चौंका दिया। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा होने तक राहुल ने एक भी बार CJP लीडर्स का नाम नहीं लिया।

21 जुलाई को पीएम आवास के बहर धरने पर बैठे राहुल को फोर्सेज ने जबरन हटाकर हिरासत में लिया था।
इलेक्शन एनालिस्ट अमिताभ तिवारी कहते हैं कि तब सरकार ने राहुल गांधी या विपक्षी नेताओं से बातचीत करने के बजाय CJP के नेताओं के साथ डील करके उनकी मांगें मान लीं, ताकि विपक्ष इसमें अपनी जीत न दिखा सके। इस्तीफे का पूरा क्रेडिट कॉकरोच पार्टी को मिला।’
सवाल-2: तो ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रोटेस्ट में आगे कौन और कैसे निकल रहा है? जवाब: SIR के मुद्दे पर विरोध प्रदर्शनों में अब तक 3 वजहों से राहुल गांधी को बढ़त मिलती दिख रही है…
1. राहुल को इस मुद्दे पर फर्स्ट मूवर एडवांटेज
- SIR में गड़बड़ी और ‘वोट चोरी’ के आरोप को राहुल गांधी करीब दो साल से एक्टिव हैं। 7 अगस्त 2025 को इस मुद्दे पर पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में महादेवपुरा सीट में धांधली के कथित सबूत दिए। अब तक 4 बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुके हैं।
- पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई कहते हैं, ‘राहुल गांधी के पास फर्स्ट मूवर्स एडवांटेज है। उन्होंने ही बिहार चुनाव के पहले यह मुद्दा उठाया था और अब ये इतना बड़ा हो गया है, तो फायदा भी उन्हें ही होगा।’
2. राहुल ने नेहा बोरा को अपने साथ लिया
- AISA अध्यक्ष नेहा बोरा इस प्रोटेस्ट का बड़ा जेन-जी चेहरा बनकर उभरी हैं। CJP अपने अगले कदम का पहले से ऐलान करती है, जबकि नेहा एक जगह की फेक कॉल देकर अचानक दूसरी जगह पहुंच जाती हैं।
- 12 अक्टूबर के सुप्रीम कोर्ट मार्च में राहुल गांधी नेहा बोरा के कंधे पर हाथ रखकर चलते दिखे। इससे संदेश गया कि युवा प्रोटेस्टर्स भी राहुल गांधी के साथ हैं।

12 अक्टूबर को मार्च के दौरान प्रियंका गांधी के साथ नेहा बोरा।
3. CJP का आगे का रास्ता क्लियर नहीं, राहुल की लंबी तैयारी
- प्रशासन की सख्ती के चलते CJP अब तक प्रोटेस्ट को ठीक से आगे नहीं बढ़ा पाई है। CJP के तीनों लीडर्स को कोर्ट से इस शर्त पर रिहा किया गया था कि वह अगले एक साल तक शांति भंग नहीं करेंगे, लेकिन 48 घंटे में ही दोबारा गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया है।
- आगे CJP क्या रास्ता अपनाएगी, ये साफ नहीं है। जबकि कांग्रेस ने इस मुद्दे पर बीते हफ्ते की तरह ही 26 नवंबर तक के रैली, मार्च और धरने के कई कार्यक्रमों का शेड्यूल तैयार किया है।

14 अक्टूबर को राहुल ने अपने घर से प्रेस कॉन्फ्रेंस की, इसमें उनके साथ आए 6 यूथ प्रोटेस्टर्स ने पुलिस पर गंभीर आरोप लगाए।
रशीद किदवई कहते हैं, ‘फिलहाल ज्ञानेश कुमार को लेकर सरकार के खिलाफ देश में दो विपक्ष हैं- कांग्रेस सहित बाकी विपक्षी दल और कॉकरोच पार्टी के बैनर तले छात्र और दूसरे लोग।
वरिष्ठ पत्रकार आदेश रावल का मानना है कि 2010 के अन्ना आंदोलन के समय बीजेपी विपक्ष में थी, और उसे आंदोलन से फायदा हुआ। इसी तरह इस बार कांग्रेस विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है, इसलिए उसे फायदा मिल सकता है।
सवाल-3: CJP इस बार पेपर-लीक जैसा आंदोलन क्यों नहीं खड़ा कर पा रही? जवाब: NEET पेपर लीक को लेकर छात्रों में सरकार के विरोध का माहौल था। उसी बीच चीफ जस्टिस सूर्यकांत के एक बयान के बाद अचानक कॉकरोच जनता पार्टी अस्तित्व में आई। CJP ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रोटेस्ट शुरू कर दिया। पुलिस एक्शन के बाद दबाव बढ़ता गया और आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा।
रशीद किदवई कहते हैं कि पेपर लीक का मुद्दा युवाओं से जुड़ा सबसे अहम मुद्दा था। चुनाव का मुद्दा क्या जनता को उसी तरह से कनेक्ट करेगा, ये नहीं कहा जा सकता।
इसके अलावा सरकार और प्रशासन की सख्ती के चलते भी प्रोटेस्ट अब तक बड़ा रूप नहीं ले पाया है।
एक बार CJP और बाकी प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पहुंच जाते और प्रोटेस्ट शुरू हो जाता, तो ये किसी भी करवट बैठ सकता है। सरकार पिछली गलती नहीं दोहराना चाहती। इसलिए दिल्ली में 38 हजार जवान तैनात कर दिए। ट्रेनें और मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए। यहां तक कि जंतर-मंतर से धरना स्थल का दर्जा भी छीन लिया।
सवाल-4: क्या CJP और कांग्रेस दोनों एक साथ आ जाएंगे? जवाब: भले ही दोनों धड़े सरकार के खिलाफ नजर आते हैं, लेकिन फिलहाल दोनों का साथ आना मुश्किल है। कई मौकों पर दोनों में साफ मतभेद दिखे हैं…
- 27 सितंबर को आशुतोष रांका और उनके साथियों को असम में एक कार्यक्रम के दौरान हिरासत में ले लिया गया था। कांग्रेस प्रवक्ता रीतम सिंह ने आरोप लगाया कि असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई जैसे नेताओं ने आशुतोष को रिहा करवाने में मदद की, लेकिन बाद में आशुतोष ने गौरव से शिष्टाचार भेंट करने से तक इनकार कर दिया। रीतम ने आरोप लगाया कि इसके लिए आम आदमी पार्टी ने निर्देश दिए होंगे। आशुतोष का जनसंपर्क अभियान असल में आम आदमी पार्टी का कार्यक्रम था। AAP दूसरों के मुद्दों को हाईजैक करने के लिए ही जानी जाती है।
- 3 अक्टूबर को सौरव दास ने X पर एक पोस्ट में कांग्रेस का नाम लिए बिना तंज कसा, ‘सिर्फ बीजेपी नहीं, एक और पार्टी सोचती है कि भारत को बचाना, संविधान को बचाना सिर्फ, उनका काम है। वो खुद को उदारवादी और संविधान का ठेकेदार बताते हैं। ये ईकोसिस्टम कई बार बीजेपी से भी बदतर है। इनको समझना चाहिए कि ये फूट डालकर राज नहीं कर सकते। इनकी बड़ी हार के चलते हम यहां तक आ गए हैं कि अब हम नौजवानों ओ रास्ता दिखाना पड़ रहा है।’








