
7 सितंबर 2026। सुबह 10 बजे का वक्त। पंजाब के संगरूर जिले का तूरबंजारा गांव। पसीने से तरबतर एक शख्स हांफते-हांफते घर में घुसता है। उसके कहने पर बेटा मोबाइल संभालता और वो वीडियो रिकॉर्ड करने लगता है।
कहता है- ‘मैं गुलजार सिंह। हरपाल चीमा और सरपंच मेरी मौत के जिम्मेदार हैं। मैंने चीमा से चिट्टे के बारे में सवाल किया था। क्योंकि मेरा बेटा चिट्टा लेता है। उसने चिट्टे के चक्कर में सब बेच दिया।
सरकार झूठ बोलती है कि चिट्टा बंद हो गया है। हरपाल चीमा और सरपंच की वजह से मैं मरने को मजबूर हूं। मैंने जहर पी लिया है।’ यह कहते-कहते गुलजार बेसुध हो गया। तड़पने लगा।
भाई बिक्कर सिंह, गुलजार को लेकर पहले संगरूर जिला अस्पताल, फिर पटियाला के राजेंद्रा अस्पताल और आखिर में लुधियाना के डीएमसी अस्पताल पहुंचा। आठ घंटे बीत चुके थे। किसी ने उसे भर्ती नहीं किया। आखिरकार शाम 5 बजे गुलजार ने दम तोड़ दिया। पुलिस भी साथ थी, फिर भी गुलजार को वक्त पर इलाज नहीं मिला।
यहां बताना जरूरी है कि पंजाब में चिट्टा उस सफेद पाउडर को कहते हैं, जिससे लोग नशा करते हैं। वहीं, हरपाल सिंह चीमा पंजाब सरकार में वित्त मंत्री हैं।
आज ब्लैकबोर्ड में इसी चिट्टे और इसकी वजह से बर्बाद हुए पंजाब के एक सिख परिवार की स्याह कहानी…
गुलजार की मौत से ठीक एक दिन पहले, यानी 6 सितंबर को प्रदेश के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने तूरबंजारा गांव में एक चुनावी रैली रखी।
मंच से वित्त मंत्री बोले- ‘हमने गांव-गांव से चिट्टे का सफाया कर दिया है। आपने कहीं कोई नशेड़ी देखा है क्या? किसी को नशा बेचते हुए देखा है?’
तभी भीड़ से एक शख्स चिल्लाया- ‘नहीं जी, यहां तो चिट्टा खुलेआम बिक रहा है।’ मैला-कुचैला कुर्ता पायजामा पहने यही शख्स था गुलजार सिंह।
मंत्री ने स्टेज से पूछा-‘कहां बिक रहा है?‘ गुलजार फौरन बोला- ‘मेरा बेटा पीता है। चिट्टे के चक्कर में उसने घर का सारा सामान बेच दिया।’
मंत्री-‘कौन देता है उसे?‘ पूछते हुए गुलजार को स्टेज पर आने का इशारा करते हैं।
गुलजार ने स्टेज की ओर बढ़ते हुए जवाब दिया- ‘यही तो हमें पता नहीं है। आप उसे पकड़ो और पूछो।’
मंत्री ने उसके कंधे पर हाथ रखा फिर माइक से हटकर कुछ बोले और गुलजार को स्टेज से नीचे भेज दिया।
सभा खत्म हुई। वित्त मंत्री लौट गए। गुलजार अपने खेतों की ओर चला गया। लेकिन गांव वालों के बीच उसे लेकर बातें होने लगीं। देखते ही देखते इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
अगली सुबह करीब 6 बजे गुलजार ने चाय के साथ रात की बासी रोटी खाई और खेत चले गए। एक घंटे बाद 7 बजे के करीब मोटरसाइकिल से सरपंच समेत पांच लोग गुलजार के घर पहुंचे। दरवाजे पर खड़े होकर आवाज देने लगे- ‘गुलजार, बाहर आ। कुछ जरूरी बात करनी है।’
गुलजार की पत्नी सुखपाल कौर ने कहा कि ‘वो घर पर नहीं है, खेत चले गए हैं।’ वो लोग खेत की ओर चल दिए। सुखपाल भी उनकी मोटरसाइकिल के पीछे- पीछे भागीं।’

गुलजार की पत्नी को अंदाजा था कि सरपंच के लोग, मंच पर जो हुआ, उसी के बारे में बात करने आए हैं।
हालांकि, सुखपाल ज्यादा देर तक उनके पीछे दौड़ नहीं पाईं और हांफती हुई घर लौट गईं। उन्होंने फौरन सरपंच के नंबर पर फोन लगाया और बोलीं- ‘कल जो कुछ भी हुआ, उसके लिए मैं हाथ जोड़कर माफी मांगती हूं। कुछ गलत न करना।’ सरपंच ने फौरन फोन काट दिया।
इसके कुछ देर बाद ही गुलजार जहर पीकर घर पहुंचा। आठ घंटे तड़पने के बाद उसकी मौत हो गई। जिस घटना के बारे में ऊपर बता चुके हैं।

गुलजार सिंह ने सरपंच और उसके लोगों से मिलने के बाद खेत में ही कीटनाशक पी लिया था।
गुलजार सिंह के छोटे बेटे सुक्खी ने बताया कि ‘पापा की मौत के बाद पुलिस ने शव कब्जे में ले लिया। हमें उनकी शक्ल तक नहीं देखने दी। हम आखिरी अरदास तक नहीं कर पाए। उन्हें नहलाया भी नहीं, कफन तक नहीं डाला। हम सब श्मशान के मेन गेट पर इंतजार कर रहे थे, लेकिन पुलिस ने पीछे के गेट से डेड बॉडी अंदर ले जाकर दाह संस्कार कर दिया।
पापा ने मुझे बताया था कि जब वे लोग खेत में पापा को धमकी देकर चले गए, तो पापा साइकिल से पास के दिड़बे गांव गए। वहां से कीटनाशक खरीदा और वापस अपने खेत लौट आए। इसके बाद उन्होंने वहीं कीटनाशक पी लिया।’
गुलजार को उन लोगों ने धमकी क्यों दी थी, इसके जवाब में संगरुर जिले के समाज सेवी जगदेव सिंह कहते हैं कि ‘पंचायत गुलजार पर दबाव बना रही थी कि वो सबके सामने माफी मांग ले। वो तो दूसरों के खेतों में काम करता था। अपने नशेड़ी बेटे की वजह से बर्बाद हो गया। एक दलित ने मंत्री से सवाल पूछ लिया ये लोगों को बर्दाश्त नहीं हुआ।’
गुलजार की बूढ़ी मां लखविंदर कौर कहती हैं-‘पुलिस वालों ने श्मशान के गेट पर ताला जड़ दिया था। हम महिलाओं को तो घर में ही बंद कर दिया था। लकड़ियां भी वही लोग लाए और पेट्रोल डालकर बेटे की लाश जला दी।
हमें आखिरी बार गुलजार का मुंह तक देखने नहीं दिया। कफन तक नहीं डालने दिया। हमें उसके आस-पास भी नहीं जाने दिया। मेरा बेटा चोर नहीं था, उसने कोई डाका नहीं डाला था।

गुलजार की मां कहती है कि मेरे बेटे ने मंत्री से सवाल किया था इसलिए मरना पड़ा।
उसने स्टेज पर किसी को गाली नहीं दी थी। हम जानते हैं कि नशे की वजह से हमारा परिवार कैसे बर्बाद हो रहा है। घर का एक-एक बर्तन बिक गया। अनाज तक बेच देता है उसका बेटा। अब तो बेचने के लिए भी कुछ नहीं बचा।’
गुलजार के भाई बिक्कर सिंह कहते हैं कि गुलजार की मौत की खबर मिलते ही पुलिस ने डीएमसी लुधियाना में ही भाई के शव को कब्जे में ले लिया था। हमारे बार-बार कहने पर भी उन लोगों ने हमें शव नहीं दिया।
ये सुनते ही हमने पुलिस से बात करने की कोशिश की। संगरूर की एसएसपी रवजोत ग्रेवाल को फोन लगाया। पहले तो उन्होंने दैनिक भास्कर का नाम सुनते ही फोन काट दिया। बार-बार फोन करने पर उन्होंने कहा- ‘मामले में सभी आरोपी गिरफ्तार हैं, इससे ज्यादा मैं इस मुद्दे पर बात नहीं करूंगी और फोन काट दिया।
चूंकि ये मामला वित्त मंत्री हरपाल चीमा से जुड़ा था, इसलिए हमने बार-बार उनसे भी बात करने की कोशिश की लेकिन दो दिन तक उन्होंने फोन नहीं उठाया।
तब हमने आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता बलतेज पन्नू से पूछा कि गुलजार ने अपने वीडियो में वित्त मंत्री को मौत का जिम्मेदार बताया है। इसपर पन्नू ने कहा- गुलजार सिंह ने दो वीडियो बनाए थे। पहले वीडियो में वित्त मंत्री का नाम नहीं था, लेकिन दूसरे में था। जरूर किसी ने दबाव देकर गुलजार सिंह से हरपाल चीमा का नाम बुलवाया है।
इसमें चार लोग गिरफ्तार कर लिए गए हैं और एक भगोड़ा है। एसआईटी बना दी गई है जो भी आरोपी होगा माफ नहीं किया जाएगा।
उनकी सफाई पर सवाल करना जरूरी था। हमने पूछा भी- आप तो चिट्टे के सफाए का वादा करके ही सत्ता में आए थे। इस पर उन्होंने तुरंत सियासी जवाब दिया-चिट्टे के बीज अकाली दल और भाजपा गठबंधन ने बोए थे। उनके नेताओं ने इसकी इतनी बड़ी फसल उगा दी कि उसे साफ करना आसान नहीं है। इसमें समय लगेगा।
घटना को करीब एक महीने बीत चुके हैं। मजहबी सिखों के मोहल्ले में गुलजार के घर सफेद रंग का शामियाना लगा है। बिना प्लास्टर वाला घर है। आंगन में दरी बिछी हुई है, दीवारें भी आधी-अधूरी बनी हैं। सफेद दुपट्टे से सिर ढंके गुलजार की विधवा सुखपाल कौर से मिलने लोग आ रहे हैं।

गुलजार की मौत को एक महीने बीत चुके हैं, अभी भी घर में लोगों का आना-जाना लगा है।
दो कमरे हैं। बेड पर मैली-कुचैली सी चादर बिछी है। खिड़कियों में शीशे नहीं हैं। बाथरूम में दरवाजा तक नहीं है। यहीं गुलजार का 24 साल का बेटा फोन चला रहा है। लाल आंखें और बेसुध हालत। जैसे उसे घर के मसलों से कोई लेना-देना नहीं है।
तभी सुखपाल कमरे में आईं, बेटे की तरफ देखते हुए बोलीं- इसकी हालत देखिए। नशेड़ी को इससे कोई लेना-देना नहीं है कि उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं रहे। उसे सिर्फ नशा चाहिए। इसी बात से गुलजार भी दुखी था। वो हमेशा कहता था कि इसे नशा देता कौन है। कहां से लाता है। इसके पास तो पैसे भी नहीं होते हैं।

गुलजार का बड़ा बेटा जिसने चिट्टे के चक्कर में घर का सारा सामान बेच दिया।
गुलजार ही कमाने वाला था। हम तो बर्बाद हो गए हैं। तीन बच्चे हैं, दो बच्चे तो अभी छोटे हैं। परमात्मा जाने अब गुजारा कैसे होगा। गांव के लोगों को ये हजम नहीं हुआ कि एक सीरी (मजहबी सिख) को मंत्री ने स्टेज पर चढ़ा लिया। इसी वजह से ये सब हुआ। एक दलित को सवाल करने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।








