
एन. रघुरामन मैनेजमेंट गुरु
साल 1984 में मुझे नौकरी करते हुए छह साल हो चुके थे। जब दूरदर्शन ने हर रविवार को स्टार ट्रेक का प्रसारण शुरू किया, तो वह मेरा पसंदीदा सीरियल बन गया। मैं ऐसे गांव में पला-बढ़ा था, जहां बैलगाड़ियां रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थीं। मैं उस दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकता था, जिसमें यह साइंस-फिक्शन सीरियल मुझे ले गया था।
अंतरिक्ष यान, सुदूर आकाशगंगाएं, भविष्य की अत्याधुनिक तकनीक और एक ऐसा कप्तान, जो बुद्धिमत्ता और गरिमा के साथ अपने दल का नेतृत्व करता था। इस सीरियल ने मेरे सामने एक ऐसी दुनिया खोल दी थी, जिसके बारे में मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। यह मेरे लिए मनोरंजन से बढ़कर एक अकल्पनीय भविष्य की खिड़की थी।
यही वजह है कि इस शुक्रवार ‘स्टार ट्रेक : द नेक्स्ट जेनरेशन’ में कैप्टन ज्यां-लुक पिकार्ड की भूमिका निभाने वाले पैट्रिक स्टीवर्ट के निधन की खबर मेरे लिए निजी क्षति जैसी है। लाखों लोग उन्हें प्रतिष्ठित अभिनेता के रूप में याद करेंगे, लेकिन मेरी उम्र के बहुत-से लोगों के लिए वे उस दुनिया का चेहरा थे, जिसने हमारी कल्पनाओं का विस्तार किया।
उन्होंने एक पूरी पीढ़ी को सिखाया कि साहस, बुद्धिमत्ता और करुणा के साथ भी नेतृत्व किया जा सकता है। स्टीवर्ट 1940 में इंग्लैंड के एक श्रमिक बहुल कस्बे में जन्मे थे। उनकी मां कपड़ा कारखाने में काम करती थीं और पिता सेना में थे। घरेलू हिंसा के कारण उनका बचपन परेशानियों से भरा रहा।
बाद में उन्होंने साहस से इन अनुभवों के बारे में खुलकर बात की। वे घरेलू हिंसा के पीड़ितों की सहायता करने वाली संस्था ‘रिफ्यूज’ के संरक्षक भी बने। अभिनय की दुनिया में उनकी यात्रा 12 साल की उम्र में तब शुरू हुई थी, जब उनके अंग्रेजी के शिक्षक सेसिल डॉर्मंड ने उन्हें शेक्सपीयर के ‘द मर्चेंट ऑफ वेनिस’ से परिचित कराया था। स्टीवर्ट इससे इतने प्रभावित हुए कि वे शेक्सपीयर के मोनोलॉग्स याद करने लगे।
एक साधारण निम्न-मध्यवर्गीय परिवार से आने वाले मेरे जैसे व्यक्ति के लिए स्टीवर्ट का शुरुआती जीवन विशेष रूप से प्रेरणादायक है। हममें से बहुत-से लोग ऐसे परिवारों में बड़े होते हैं, जहां शिक्षा हासिल करना, रोजी-रोटी कमाना और माता-पिता का सहारा बनना प्राथमिकताएं होती हैं। ऐसे में सपनों को अकसर तब तक इंतजार करना पड़ता है, जब तक जिम्मेदारियां पूरी न हो जाएं।
स्टीवर्ट की कहानी भी इससे अलग नहीं थी। उन्होंने 15 की उम्र में स्कूल छोड़ दिया और आजीविका के लिए अखबार में रिपोर्टर तथा फर्नीचर विक्रेता के रूप में काम किया। लेकिन उन्होंने हालात को अपने जुनून को कुचलने नहीं दिया। आखिरकार उन्हें ब्रिस्टल ओल्ड विक थिएटर स्कूल में छात्रवृत्ति मिली और इसके बाद उन्होंने अभिनय की दुनिया में एक उल्लेखनीय करियर बनाया।
उनकी जिंदगी से सीखने लायक बात यह है कि जीवन की व्यावहारिक जरूरतों से जूझते हुए भी शेक्सपीयर के प्रति अपने प्रेम को कभी नहीं छोड़ा। उनके करियर का सबसे बड़ा सबक उस समय सामने आया, जब 47 की उम्र में उन्होंने कैप्टन पिकार्ड की चुनौतीपूर्ण भूमिका स्वीकारी, जबकि साइंस-फिक्शन उनकी पसंद नहीं थी। उन्होंने अपने सह-कलाकारों से सीखा।
उन्होंने अपने बुनियादी सिद्धांतों को कभी नहीं छोड़ा और रंगमंच की दुनिया में भी लौटते रहे। हर सुबह वे चाय के साथ 20 से 30 मिनट कोई किताब पढ़ते थे। सफलता ने उन्हें अपनी जिज्ञासाएं शांत करने से नहीं रोका। हर सुबह इस स्तम्भ को लिखना मेरे लिए भी एक ऐसा छोटा-सा निजी अनुशासन है, जिसे मैंने उनसे सीखा है। उनकी जीवन-यात्रा हर युवा को बताती है कि आजीविका कमाने और सपने संजोने में विरोध नहीं है।
अपने जुनून को कुछ समय के लिए टालना पड़ सकता है, पर उसे कभी छोड़ना नहीं चाहिए। यही वजह है कि 55 की उम्र में भी मैंने दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में जाकर सीखने का फैसला किया था।
शायद किसी दिवंगत व्यक्ति को याद करने का यही सबसे बेहतर तरीका है कि हम केवल उनकी उपलब्धियां ही न गिनाएं, उनके जीवन से भी कुछ ग्रहण करें- सीखते रहें, सहकर्मियों का सम्मान करें, खुद को गढ़ें, अपनी जड़ों से जुड़े रहें और उन चीजों के लिए समय निकालें, जिन्हें हम प्यार करते हैं।
फंडा यह है कि मृत्यु किसी व्यक्ति के जीवन का अंत कर सकती है, लेकिन इससे उन सिद्धांतों को अपनाने का सिलसिला समाप्त नहीं हो जाता, जिनके लिए हम उनकी सराहना करते थे।








