
नैनवां के शांति वीर धर्मस्थल पर शुक्रवार को आचार्य सुंदर सागर महाराज की अष्टद्रव्य से पूजा हुई। इसके बाद धर्मसभा में आर्यिका संस्कृति माताजी ने मनुष्य जीवन, पुण्य कर्मों और सच्चे गुरु के मार्गदर्शन पर बात की।
माताजी ने कहा कि मनुष्य जीवन पाना आसान है, लेकिन उच्च कुल, संपन्न और धार्मिक परिवार मिलना पुण्य का फल है। उन्होंने बताया कि यह जीव कई जन्मों के बाद मनुष्य जीवन तक पहुंचा है।
उन्होंने दूध में घी के उदाहरण से समझाया कि धर्म और पुण्य को समझने के लिए प्रयास करना पड़ता है। आत्मकल्याण के लिए धर्म, संयम और अच्छे कर्म जरूरी हैं।
माताजी ने मंदिर जाने के महत्व को गुलाब के दो फूलों के उदाहरण से समझाया। एक फूल भगवान को चढ़ता है, दूसरा अर्थी पर। इससे उन्होंने भाव, कर्म और समर्पण का महत्व बताया। सच्चे गुरु शिष्य को संसार के अंधकार से निकालकर प्रकाश का मार्ग दिखाते हैं।
उन्होंने आगे बताया कि जब शिष्य स्वयं को गुरु के चरणों में समर्पित कर देता है, तो गुरु उसे सही मार्ग दिखाते हुए जीवन की बाधाओं से उबरने की प्रेरणा देते हैं। गुरु का मार्गदर्शन डूबते हुए व्यक्ति को सहारा देने और भटकते हुए जीव को सही दिशा दिखाने के समान है।
दिगंबर जैन समाज के प्रवक्ता महावीर सरावगी ने बताया कि धर्मसभा में मंगलाचरण आशीष जैन मोड़ीका ने किया।







