आज का एक्सप्लेनर:मुस्कान-साहिल की फांसी लिखकर जज ने पेन क्यों फेंका, फांसी पर क्या बहस चलती है, ये मामला जज ने रेयर क्यों माना

14 अक्टूबर की शाम 4:22 बजे। मेरठ डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज अरविंद कुमार मिश्रा ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला से कहा- तुम दोनों ने सौरभ राजपूत की हत्या की है।

जज ने दोनों को फांसी देने का फैसला सुनाया और महाभारत के श्लोक का हिंदी अनुवाद कोट करते हुए कहा- ‘अधर्म करने वाले को सजा देना भी धर्म है।’ इसके बाद उन्होंने जिस पेन से मुस्कान-साहिल के लिए मृत्युदंड लिखा था, उसको तुरंत डस्टबिन में फेंक दिया।

मौत की सजा लिखने में इस्तेमाल हुआ पेन फेंकने या उसकी निब तोड़ने का चलन क्यों है; मौत की सजा के खिलाफ और समर्थन में क्या बहस चलती है, जानेंगे आज के एक्सप्लेनर में…

सवाल-1: मुस्कान-साहिल की फांसी का फैसला लिखकर जज ने पेन क्यों फेंक दिया?

जवाब: मौत की सजा के फैसले पर साइन के बाद पेन फेंकने या निब तोड़ने का कोई कानून नहीं है। ये मुगल काल से चली आ रही एक परंपरा है। मुगल बादशाह मौत की सजा का फरमान लिखने वाली कलम तोड़ देते थे। फिर ब्रिटिश काल में अंग्रेज जजों ने ये प्रथा अपना ली। आजादी के बाद भी भारत में ये परंपरा कायम है।

सदियों पहले से यूरोपीय देशों में ये चलन रहा है। खास तौर पर जर्मनी, फ्रांस जैसे देशों में मौत की सजा सुनाने के बाद जज अपनी कलम तोड़ देते थे। हंगरी जैसे कुछ देशों में जज के पास राजदंड जैसी एक छड़ होती थी। फांसी की सजा सुनाकर जज उसे तोड़ देते थे। बाद में इन प्रथाओं का चलन कम हो गया, लेकिन अभी भी कई देशों में ऐसा होता है।

फरवरी 2026 में केन्या की एक कोर्ट के जज किजिटो मगारे ने 7 साल की बच्ची के रेप और मर्डर के दोषी 35 साल के निकोलस मचारिया को फांसी की सजा सुनाकर पेन तोड़ दिया।

फरवरी 2026 में केन्या की एक कोर्ट के जज किजिटो मगारे ने 7 साल की बच्ची के रेप और मर्डर के दोषी 35 साल के निकोलस मचारिया को फांसी की सजा सुनाकर पेन तोड़ दिया।

जानकार मानते हैं कि इसके पीछे 3 तरह की मैसेजिंग है…

1. ये दिखाना कि फैसला आखिरी है

  • टूटे हुए पेन को दोबारा इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता। उसी तरह उसी कोर्ट में मौत की सजा को बदला या उस पर दोबारा विचार नहीं किया जा सकता।
  • कुछ देशों में जज निब तोड़ने के साथ बोलते भी हैं कि ये आखिरी फैसला है और इसे बदला नहीं जा सकता। जज ये मैसेज देते हैं कि अब इस मामले में इस कोर्ट की कोई भूमिका नहीं है। उनके स्तर पर मामला खत्म हो गया है।

2. फैसले से भावनात्मक दूरी

  • टूटा हुआ पेन जज की इच्छा जताता है। वह ये दिखाना चाहते हैं कि वह किसी की मौत लिखने वाले पेन को दोबारा इस्तेमाल में नहीं लाना चाहते। वह एक कानूनी कर्तव्य तो पूरा कर रहे हैं, लेकिन वह इससे अपनी अस्वीकृति भी जताते हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट के वकील आर्या सुरेश बताते हैं, ‘टूटा हुआ पेन खुद को हल्का करने का तरीका है। कुछ इस तरह कि मैंने कानून के हिसाब से काम किया। कलम टूट गई, अब काम खत्म। ये रस्म जज और उसके फैसले के नतीजे के बीच थोड़ी दूरी बना देती है।’

3. फैसले की गंभीरता और गरिमा

  • फांसी की सजा सबसे गंभीर सजा है। पेन तोड़कर जज इस गंभीरता और इसमें सजा पाने वाले व्यक्ति के जीवन के खत्म होने का संदेश देते हैं।

हालांकि सभी जज ऐसा नहीं करते। मसलन, 20 जनवरी 2025 को केरल के डिस्ट्रिक्ट सेशंस जज ए. एम. बशीर ने शेरोन राज हत्याकांड में उसकी पार्टनर ग्रीष्मा को फांसी की सजा सुनाई, लेकिन उन्होंने पेन या उसकी निब नहीं तोड़ी। कुछ सीनियर वकीलों ने बताया कि बशीर ये नहीं मानते कि फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया जा सकता या पेन का इस्तेमाल दूसरे फैसलों में नहीं किया जाना चाहिए।

ग्रीष्मा ने 23 साल के शेरोन को घर बुलाकर आयुर्वेदिक काढ़े के नाम पर कीटनाशक पिलाकर उसकी हत्या कर दी थी।

ग्रीष्मा ने 23 साल के शेरोन को घर बुलाकर आयुर्वेदिक काढ़े के नाम पर कीटनाशक पिलाकर उसकी हत्या कर दी थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, साहिल-मुस्कान को सजा सुनाने वाले जज मिश्र ने बॉलपेन इस्तेमाल किया, शायद इसलिए उन्हें पेन की निब तोड़ने की जरूरत नहीं पड़ी।

सवाल-2: फांसी की सजा को लेकर सही-गलत की बहस क्या है?

जवाब: दुनिया के ज्यादातर देशों में मौत की सजा को गलत माना जाने लगा है। 17 दिसंबर 2024 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने बहुमत से मौत की सजा पर रोक का प्रस्ताव पारित किया है।

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक, 2025 तक दुनिया के 145 देशों में मौत की सजा खत्म की जा चुकी है। हालांकि UN का प्रस्ताव किसी देश पर बाध्यकारी नहीं है। भारत सहित कई देशों में अभी भी मौत की सजा दी जाती है।

2025 में 17 देशों में कम से कम 2,707 लोगों को मौत की सजा दी गई। ये 2024 के मुकाबले 78% ज्यादा है और 1981 के बाद सबसे बड़ा आंकड़ा है।

मौत की सजा का समर्थन करने वाले 2 बड़े तर्क देते हैं…

  1. अपराध के बराबर सजा: अपराधियों को उनके अपराध की गंभीरता के अनुपात में वही सजा मिलनी चाहिए, जिसके वह हकदार हैं। मृत्युदंड पीड़ित के परिवारों के लिए आखिरी और उचित राहत है।
  2. अपराध रोकने के लिए जरूरी: फांसी देने से भविष्य में अपराधी के और ज्यादा क्रूर अपराध या हत्या करने से रोका जा सकता है।

वहीं मौत की सजा के खिलाफ सबसे बड़ा नैतिक तर्क ये है कि आप किसी को जीवन नहीं दे सकते, तो नैतिक रूप से आपको भी जीवन छीनने का अधिकार नहीं है।

हालांकि 3 कानूनी तर्क भी दिए जाते हैं….

  • अपराध रोकने में कारगर नहीं: आंकड़े ये साबित नहीं करते कि फांसी की सजा अपराध रोकने में कारगर है। जिनको फांसी दी गई, उनमें से कुछ लोग मानसिक बीमार हो सकते हैं, जिन्हें अपराध करने से नहीं रोका जा सकता। एनुअल स्टैटिस्टिक्स 2025 के मुताबिक, 2025 तक भारत में 564 लोग मौत की सजा पा चुके हैं और इनको फांसी दी जानी है। इनमें से 90.5% लोगों के बारे में ट्रायल कोर्ट ने उनकी मेंटल हेल्थ की रिपोर्ट या जेल में उनके आचरण जैसी जानकारी नहीं ली। आर्या सुरेश कहते हैं कि भारत में 2013 से बलात्कार के मामलों में फांसी की सजा का प्रावधान है, फिर भी बलात्कार होते हैं। बलात्कार के मामलों में कई तरह की क्रूरता भी बढ़ी है।
  • निर्दोष लोगों को मारने का खतरा: न्याय प्रणाली में गलतियों और खामियों के चलते कई निर्दोष लोगों का जीवन का अधिकार छिन सकता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक, जब तक मानवीय न्याय में खामियां हैं, तब तक निर्दोषों की फांसी का खतरा खत्म नहीं हो सकता।
  • सुधार का मौका खत्म करना: मृत्युदंड को पलटा नहीं जा सकता। दोषी दोबारा समाज में वापस नहीं आ सकता और उसे सुधार का मौका नहीं मिलता।

सवाल-3: भारत में फांसी की सजा को लेकर क्या सोच और कानून हैं?

जवाब: भारत का सुप्रीम कोर्ट कहता है कि दंडशास्त्र के सिद्धांतों के पीछे ‘मानव जीवन को बचाने’ की फिलॉसफी है। सजा अपराध कम करने और अपराधियों के ‘उचित इलाज के जरिए आम जनमत को संतुष्ट करने का तरीका है।’

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, ‘मौत की सजा एक निवारक (यानी अपराध रोकने का प्रभावी तरीका) है और समाज की उचित मामलों में उचित सजा देने की जो मांग है, उसका जवाब है।’

भारत में हत्या, बलात्कार और देशद्रोह जैसे गंभीर अपराधों में फांसी दी जा सकती है। इसको लेकर आजादी के बाद से कई अहम बदलाव हुए हैं…

  • 1955 के पहले तक भारत में गंभीर अपराधों में फांसी की सजा का नियम था, जबकि उम्रकैद अपवाद थी। अगर कोर्ट उम्रकैद देता, तो उसे इसकी वजह बतानी होती थी।
  • 1955 में क्रिमिनल प्रोसीजर एमेंडमेंट एक्ट, CrPC के संशोधन के बाद से कोर्ट फांसी या उम्रकैद में से एक का चुनाव कर सकते हैं।
  • 1973 में CrPC के 354 (3) के तहत तय हुआ कि अब फांसी अपवाद होगा, जबकि उम्रकैद नियम होगा। कोर्ट फांसी की सजा सुनाने की वजह लिखित में बताएंगे।
  • 1973 और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में कहा कि अगर किसी अपराधी का हत्या करने वाला कृत्य सुनियोजित और खतरनाक तरीके से समाज की सुरक्षा को खतरे में डालता है, तो कानूनी प्रक्रिया के तहत उसका आर्टिकल 21 से मिला जीवन का अधिकार खत्म किया जा सकता है। यानी यह असंवैधानिक नहीं है।
  • हालांकि 1980 में बने सुप्रीम कोर्ट के ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ के मुताबिक, मौत की सजा केवल उन दुर्लभतम मामलों में ही दी जा सकती है, जब कोई और विकल्प न बचा हो। दुर्लभतम मामले का मतलब है- ‘कोई हत्या अत्यंत क्रूर, घृणित और निंदनीय तरीके से की जाए, जिससे समाज में बहुत ज्यादा आक्रोश पैदा होता हो और जब हत्या के पीछे घृणा और क्रूर भावनाएं ही मुख्य मकसद हो।’
बाएं 19 मार्च, 2025 को पेशी के दौरान मुस्कान। सजा का ऐलान होते ही सौरभ की मां रेनू ने रोते हुए कहा- मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को जब फांसी पर लटकाया जाएगा, तब मुझे पूरा न्याय मिलेगा।'

बाएं 19 मार्च, 2025 को पेशी के दौरान मुस्कान। सजा का ऐलान होते ही सौरभ की मां रेनू ने रोते हुए कहा- मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल को जब फांसी पर लटकाया जाएगा, तब मुझे पूरा न्याय मिलेगा।’

हालांकि भारत में मौत की सजा सुनाने की प्रक्रिया पर कई सवाल उठाए जाते हैं…

  • प्रोजेक्ट 39A की रिपोर्ट के मुताबिक, फांसी की सजा पाए ज्यादातर दोषियों को सही कानूनी मदद नहीं मिलती। ज्यादातर दोषी गरीब और कमजोर सामाजिक वर्गों से हैं।
  • अपील के बाद फांसी को उम्रकैद में बदल दिया जाता है या फिर सजा रद्द हो जाती है। 2016 से 2025 तक सेशंस कोर्ट ने 1,279 आरोपियों को फांसी की सजा दी, लेकिन हाई कोर्ट ने सिर्फ 70 लोगों की सजा बरकरार रखी।
  • आर्या सुरेश कहते हैं, ‘इसका मतलब है कि कुछ लोगों को गलत तरीके से फांसी की सजा मिली थी। कई मौजूदा और रिटायर्ड जज खुद कह चुके हैं कि उनके सुनाए फांसी के फैसलों में कुछ गलती हो सकती है। अगर फांसी हो जाए, तो जजमेंट की इस गलती को सुधारने का मौका ही नहीं बचता।’
  • ‘जन-आक्रोश, राजनीतिक और कई बार अपराधी की सामाजिक पहचान के हिसाब से ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ के सिद्धांत का गलत तरीके से इस्तेमाल किया जाता है। ये फांसी की सजा को सीमित करने के लिए था, लेकिन अब ये फांसी को सही ठहराने के काम आ रहा है।’
  • हत्या के अलावा भी कई ऐसे मामलों में मौत की सजा दी जाती है, जिनमें किसी की जान नहीं ली गई जैसे- ड्रग तस्करी के मामले, आतंकवाद का आरोप, देश के खिलाफ जंग छेड़ना।
  • 2015 में विधि आयोग ने आतंकवाद और देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने के अपराधों को छोड़कर बाकी मामलों में मौत की सजा खत्म करने की सिफारिश की, लेकिन इन्हें लागू नहीं किया गया।

पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे इतिहाकार गोपालकृष्ण गांधी ने अपनी किताब ‘एबॉलिशिंग द डेथ पेनाल्टी’ में लिखा है, ‘मौत की क्रूर सजा अपराध रोकने में असरदार नहीं है। ये बदले की जरूरत को पूरा नहीं करती। ये सिर्फ समाज को राज्य की मंजूरी से हत्या करने की आदत डालती है। ये न्याय नहीं, एक आदत है।’

2022 में एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने 7 साल की बच्ची के रेप के दोषी की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया था। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के जजों से कहा था, ‘केवल अपराध की भयावह प्रकृति और समाज पर प्रभाव के चलते मृत्युदंड के पक्ष में न जाएं। आजीवन कारावास पर भी समान रूप से विचार करें।’

सवाल-4: साहिल-मुस्कान के अपराध को अदालत ने रेयरेस्ट ऑफ रेयर क्यों माना?

जवाब: 29 साल के मर्चेंट नेवी अफसर रहे सौरभ राजपूत को नशीला पदार्थ देकर चाकू से मारा गया। साहिल और मुस्कान ने शव के टुकड़े करके उन्हें सीमेंट के साथ नीले ड्रम में जाम कर दिया था। 13 महीने के ट्रायल में 126 सुनवाइयां हुईं। 22 गवाह पेश किए गए।

अभियोजन पक्ष के सरकारी वकील के.के. चौबे की दलील थी कि ये पूरी प्लानिंग और साजिश के तहत किया गया अपराध था। कोर्ट अपराध की क्रूरता देखे और सिर्फ कम उम्र या पहले अपराध के आधार पर सजा कम न हो। इस केस के बाद पति, पत्नी के पवित्र रिश्ते की विश्वसनीयता का हनन हुआ है।

जज ने अपने फैसले में अपराध को ‘बेहद क्रूर और गंभीर’ माना। सबूतों के आधार पर इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ की कैटेगरी में रखा और 30 सितंबर को साहिल और मुस्कान को हत्या का दोषी करार दिया था।

साहिल और मुस्कान के पास अभी हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक सजा के खिलाफ अपील करने के विकल्प हैं। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने निचली कोर्ट से मिली एक भी फांसी की सजा को बरकरार नहीं रखा। ऐसा लगातार तीसरी साल हुआ।

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