पेरेंटिंग- शहर में आकर बच्चा अकेला हो गया है:दादा-दादी की याद में हर वक्त उदास रहता है, उसे इस नए माहौल में कैसे ढालें

सवाल- मैं 35 साल का हूं। मेरा 5 साल का बेटा जन्म से अब तक गांव में दादा-दादी और परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ जॉइंट फैमिली में रहा है। वहां उसके साथ खेलने के लिए हमेशा कोई-न-कोई बच्चा या बड़ा मौजूद रहता था। नौकरी की वजह से अब हम उसे अपने साथ शहर ले आए हैं।

यहां वह ज्यादातर घर में ही रहता है। आसपास उसके खेलने के लिए कोई बच्चा नहीं है। पिछले कुछ समय से वह बहुत चुप और मायूस रहने लगा है और बार-बार दादा-दादी के पास जाने की बात करता है। हमें लगता है कि वह अपने पुराने माहौल को मिस कर रहा है। यहां शहर में वह अकेला पड़ गया है। उसे इस नए माहौल में कैसे एडजस्ट कराएं?

एक्सपर्ट- डॉ. अमिता श्रृंगी, साइकोलॉजिस्ट, फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर, जयपुर

जवाब- सवाल पूछने के लिए शुक्रिया। पांच साल के बच्चे के लिए गांव से शहर आना सिर्फ घर बदलना नहीं है। उसके लिए इसका मतलब अपने परिचितों, दोस्तों, डेली रूटीन और सेफ माहौल से दूर होना भी है।

जिस बच्चे को अब तक हर समय किसी-न-किसी का साथ मिलता था, उसे अचानक घर में अकेले रहना पड़ रहा है। ऐसे में उसका उदास होना, दादा-दादी को याद करना और गांव वापस जाने की जिद करना स्वाभाविक है।

यहां सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि बच्चा जानबूझकर परेशान नहीं कर रहा है। वह अपने तरीके से बदलाव का दुख और अकेलापन जाहिर कर रहा है। ऐसे में उसे पेरेंट्स के इमोशनल सपोर्ट की जरूरत है।

बच्चे की उदासी की असल वजह

पांच साल की उम्र में बच्चे अपनी भावनाओं को शब्दों में ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते। वे यह भी समझ नहीं पाते कि बदलाव क्यों हुआ है और यह कब तक रहेगा। ऐसे में वे अपने इन व्यवहारों के जरिए परेशानी जाहिर कर सकते हैं-

  • चुप या उदास रहना।
  • बार-बार रोना या चिड़चिड़ा होना।
  • पुरानी जगह पर लौटने की जिद करना।
  • हर समस पेरेंट्स से चिपके रहना।

बच्चे की उदासी के पीछे और भी कई वजहें हो सकती हैं। इसे ग्राफिक में देखिए-

पेरेंट्स क्या करें?

बच्चे को जब पुराने घर, दादा-दादी या अपने दोस्तों की याद आए, तो उसे समझाने या चुप कराने की जल्दबाजी न करें। उसकी उदासी को समझें। उसे महसूस होने दें कि उसकी भावनाएं आपके लिए मायने रखती हैं। वह रोए या बार-बार घर लौटने की बात करे तो डांटने की बजाय प्यार से कहें-

“तुम्हें दादी की याद आ रही है न? मुझे पता है कि तुम्हें उनकी कमी खल रही है।”

इससे बच्चे को लगेगा कि माता-पिता उसकी भावनाएं समझते हैं। यही भरोसा उसे नए माहौल में सहज होने और धीरे-धीरे बदलाव को स्वीकार करने में मदद करता है। साइकोलॉजी में इसे ‘इमोशनल वैलिडेशन’ कहते हैं।

बच्चे की भावनाओं को कैसे संभालें?

भावनाओं में आकर बच्चे से यह वादा न करें कि उसे जल्द ही गांव ले जाएंगे, जब तक कि ऐसा तय न हो। झूठी उम्मीद से उसका भरोसा कमजोर हो सकता है। इसके बजाय-

  • उसे नए घर और आसपास के माहौल से परिचित होने का समय दें।
  • शुरुआत में उसे साथ लेकर पास के पार्क, बाजार या प्ले ग्राउंड में जाएं।
  • बच्चा सहज महसूस करे तो धीरे-धीरे एक्टिविटीज बढ़ाएं।
  • ध्यान रखें, कुछ बच्चे आसपास के माहाैल में जल्दी घुलते-मिलते हैं, जबकि कुछ को ज्यादा समय लगता है।
  • अगर वह रोता है तो उसे तुरंत चुप कराने या ध्यान भटकाने की जरूरत नहीं है।
  • पहले उसे सांत्वना दें, फिर किसी पसंदीदा एक्टिविटी में शामिल होने का मौका दें।
  • ऐसी अपेक्षा न रखें कि बच्चा हर समय खुश नजर आए। नए माहौल में सहज होने में समय लग सकता है।

इसके साथ ही कुछ बातों का ध्यान रखें-

बच्चे को नए माहौल में कैसे एडजस्ट कराएं?

आपके मामले में एक बड़ी समस्या यह है कि बच्चा दिन में ज्यादातर समय घर पर रहता है और उसके आसपास खेलने के लिए दूसरे बच्चे भी नहीं हैं। ऐसे में सिर्फ उसे समझाते रहना काफी नहीं है। उसे दूसरे बच्चों के साथ जुड़ने के मौके भी देने होंगे।

  • अपने घर के आसपास के पार्क, खेल के मैदान, लाइब्रेरी या बच्चों की एक्टिविटीज वाली जगहों का पता लगाएं।
  • शुरुआत में बच्चे के साथ वहां जाएं। उसे दूसरे बच्चों को खेलते हुए देखने दें और अपने कंफर्ट के अनुसार उनके पास जाने दें।
  • तुरंत दोस्त बनाने या सबके साथ घुलने-मिलने का दबाव न डालें।
  • अगर आसपास कोई परिचित परिवार है, जिसके बच्चे लगभग उसकी उम्र के हैं तो उनके साथ नियमित रूप से खेलने का समय तय कर सकते हैं।
  • एक ही बच्चे से बार-बार मिलना दोस्ती को आसान बना सकता है।

बच्चे को नए दोस्त बनाने में मदद करने के लिए ये तरीके अपना सकते हैं-

दादा-दादी से जुड़ाव जरूरी

  • बच्चे के लिए दादा-दादी सिर्फ परिवार के सदस्य नहीं, बल्कि उसके जीवन का अहम हिस्सा हैं।
  • शहर आने का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि वह उनसे पूरी तरह कट जाए।
  • रोज वीडियो कॉल पर दादा-दादी से बात कराएं। इसके लिए एक नियमित समय तय करें।
  • दादा-दादी बच्चे से प्यार से बात करें, उसके दिन के बारे में पूछें।
  • उसे अपनी छोटी-छोटी बातें बताने के लिए प्रोत्साहित करें।
  • हो सके तो दादा-दादी को बीच-बीच में अपने पास बुलाएं।
  • गांव में उसके साथ खेलने वाले बच्चों से भी कभी-कभी बात कराएं।
  • उसे गांव की कोई पसंदीदा चीज, परिवार की तस्वीर या दादा-दादी की दी हुई कोई वस्तु अपने कमरे में रखने दें।
  • इससे उसे यह एहसास होगा कि नया घर अपनाने का मतलब पुराने परिवार को भूलना नहीं है।

पेरेंट्स इन बातों का ध्यान रखें

कई बार पेरेंट्स नौकरी और घर की जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि बच्चे को समय नहीं दे पाते। यह व्यस्तता मजबूरी हो सकती है। लेकिन बच्चे की भावनात्मक जरूरतों को पूरा करने के लिए कुछ समय निकालना जरूरी है।

  • ऑफिस से लौटने के बाद बच्चे से पूछें कि उसका दिन कैसा रहा।
  • उसके खेल, पसंद और भावनाओं पर बात करें। जब वह अपनी बात बताए तो बीच में टोके बिना सुनें।
  • अगर वह बार-बार कहता है कि उसे गांव जाना है तो हर बार समझाने की कोशिश न करें। पहले उसकी बात सुनें, फिर अपनी स्थिति बताएं।
  • अगर माता-पिता दोनों व्यस्त हैं तो बच्चे की देखभाल के लिए किसी भरोसेमंद व्यक्ति की व्यवस्था करें।
  • ऐसा व्यक्ति चुनें, जो बच्चे की जरूरतों को समझे और उसके साथ संवेदना और धैर्य से पेश आए।

पेरेंट्स न करें ये गलतियां

पेरेंट्स कभी-कभी बच्चे का ध्यान डायवर्ट करने के लिए उसे खिलौने, मोबाइल या दूसरी चीजें देने लगते हैं। लेकिन अकेलेपन की समस्या का समाधान केवल मनोरंजन नहीं है। बच्चे को किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है, जिसके साथ वह खेल सके, बात कर सके और अपनी भावनाएं शेयर कर सके।

  • उसे उदास देखकर यह न कहें कि ‘तुम्हारे पास सब कुछ तो है, फिर दुखी क्यों हो?’
  • इससे बच्चा अपनी भावनाएं छिपाने लगता है। उसकी तुलना गांव में रहने वाले या दूसरे बच्चों से न करें।

पेरेंट्स को कुछ गलतियों से बचना चाहिए-

एक्सपर्ट से कब मिलें?

नए माहौल में आने के बाद कुछ समय तक उदासी या असहजता सामान्य है। लेकिन इन संकेतों को नजरअंदाज न करें-

  • लगातार उदास रहना।
  • खेलने में रुचि खोना।
  • नींद, भूख में बदलाव।
  • ज्यादा चिड़चिड़ापन।
  • बार-बार बीमार होना।
  • लोगों से बात न करना।

ऐसे बदलाव लंबे समय तक बने रहें, बढ़ें या बच्चे की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित करने लगें, तो चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से सलाह लें।

अंतिम बात

बच्चे को नई जगह में ढलने के लिए समय, अपनापन और दूसरे बच्चों के साथ घुलने-मिलने के मौके दें। उसे भरोसा दिलाएं कि पुराने लोग आज भी उससे प्यार करते हैं और नए शहर में भी वह नए दोस्त बना सकता है। आपके धैर्य और सहयोग से उसके लिए नए माहौल में सहज होना आसान होगा।

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