
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु
क्या आपने कभी अपने बच्चों से कहा है कि वे ट्रैफिक सिग्नल पर गुलाब, फ्लॉवर बुके या छोटी-मोटी चीजें बेचने वाले बच्चों को गौर से देखें? अगली बार जब आप डिनर के बाद घर लौटें तो उनसे कहें कि वे देखें कि रास्ते में पड़ने वाले कुछ सिग्नलों पर क्या होता है। शायद वे ऐसा सबक सीख सकें, जो कोई क्लासरूम नहीं सिखा सकता।
कम से कम मुंबई में तो यह नजारा आम है। सिग्नल रेड होता है और कारों की कतार रुक जाती है। गाड़ियों के भीतर लोग एसी के आराम में बैठ जाते हैं। कुछ फोन देखते हैं, कुछ बातचीत में लगे रहते हैं और शेष ग्रीन लाइट होने के इंतजार में सामने देखते रहते हैं। लेकिन बाहर एक बिल्कुल अलग दुनिया जीवंत हो उठती है।
फीकी कमीज और फटी शॉर्ट्स पहने एक लड़का नंगे पैर जल्दबाजी में गाड़ी चलाने वालों और तेज रफ्तार टू-व्हीलर्स से बचता हुआ तेजी से कारों के बीच दौड़ता है। उसके एक हाथ में गुलाब का बंच तो दूसरे में कुछ छोटे खिलौने या सजावटी चीजों की लड़ियां होती हैं। गाड़ियों की विंडो पर टिकी उसकी नजरें किसी ऐसे को तलाशती हैं, जो उससे कुछ खरीद ले। उसके लिए हर बार रेड सिग्नल होना सफर में ठहराव नहीं, बल्कि अवसर की खिड़की है। हर कार में बैठा पैसेंजर उसके लिए संभावित ग्राहक है।
इसलिए वह पहली कार के पास रुकता है और धीरे से खिड़की खटखटाता है। अंदर बैठा व्यक्ति दूसरी ओर देखने लगता है। वह अगली गाड़ी पर जाता है। वहां एक आदमी फोन पर व्यस्त है। उसके पीछे वाली कार में एक कपल बातचीत में लगा है और विंडो से झांकते उस छोटे-से चेहरे पर ध्यान तक नहीं देता। कोई सिर हिलाकर मना कर देता है। कोई झुंझलाते हुए उसे हटने का इशारा करता है। कई लोग ऐसा दिखाते हैं, जैसे उन्होंने उसे देखा ही न हो।
उसने किसी के कहे बिना ही ‘ना’ सुन लिया है, फिर भी वह आगे बढ़ता है। सिग्नल के ग्रीन होने में कुछ ही सेकंड बचे होते हैं तो वह एक और कार पर पहुंचता है। गुलाब खिड़की की ओर बढ़ाते हुए चमकीली मुस्कान के साथ कहता है कि ‘क्या आप मैडम के लिए ये खूबसूरत फूल खरीदना चाहेंगे?’
उसकी आवाज में उम्मीद, जल्दबाजी और थोड़ी निराशा भी होती है। उसे पता है कि समय उसके खिलाफ है। लाइट ग्रीन होते ही कारें बढ़ जाएंगी और अगले रेड सिग्नल तक के लिए उसका मौका खत्म हो जाएगा।
अगर गाड़ी में बैठा व्यक्ति मना कर देता है तो वह हाथ में पकड़े गुलाबों को देखता है। शायद उसे चिंता होती है कि गर्मी और धूल में ये फूल कितनी देर ताजे रहेंगे। शायद वह सोचता है कि किसी के खरीदने से पहले उसे और कितने सिग्नल पार करने होंगे। एक पल के लिए उसके चेहरे पर निराशा भी दिख सकती है। लेकिन फिर वह खुद को संभालता है, अगली कार की ओर मुड़ता है और एक बार फिर कोशिश करता है।
पैरेंट्स के तौर पर हम अपने बच्चों को जीत के लिए तैयार करने में वर्षों लगा देते हैं। हम उनसे कहते हैं कि ज्यादा अंक लाएं, बेहतर प्रदर्शन करें, एडमिशन सिक्योर करें और इंटरव्यू में सफल हों। लेकिन क्या हम उन्हें उन लोगों के लिए भी तैयार करते हैं, जो उन्हें मना कर देंगे; वो अवसर, जिन्हें वो खो देंगे और वो सपने, जो पहली कोशिश में पूरे नहीं होंगे?
जिंदगी हर बार ‘हां’ नहीं कहती। आत्मविश्वास खोए बिना ‘ना’ सुनना सीखना जिंदगी के सबसे कीमती सबकों में से एक हो सकता है। इस सिनेरियो में हम अपने बच्चे को सिखा रहे हैं कि उस लड़के को दिखाने का मकसद यह बताना नहीं कि वह फूल बेचने के लिए कितनी मेहनत कर रहा है, बल्कि यह सिखाना है कि रिजेक्शन को कैसे स्वीकार करें और दोबारा कोशिश करने की हिम्मत कैसे जुटाएं।
बेशक, किसी बच्चे को रोजी-रोटी कमाने के लिए व्यस्त सड़कों पर जान जोखिम में नहीं डालनी चाहिए। उसकी परिस्थितियां इस लायक हैं कि हम उसके प्रति करुणा दिखाएं और समाज उस पर ध्यान दे। लेकिन जो दृढ़ता वह दिखाता है, वो हमें सिखा सकती है कि रिजेक्शन का सामना कैसे करें।
फंडा यह है कि अगली बार जब आपका बच्चा किसी परीक्षा में फेल हो जाए, किसी कॉम्पीटिशन में विफल हो या नौकरी का मौका गंवा बैठे तो उसे इंतजार करती उन कारों के बीच खड़े उस लड़के की याद दिलाएं। उसे सिखाएं कि एक इनकार किसी की अहमियत कम नहीं करता। एक झटके का मतलब सफर का अंत नहीं होता।







