
गुजरात की एक कोर्ट ने गोहत्या के दोषी 3 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। कोर्ट ने फैसले में मनुस्मृति और वेदों का जिक्र करते हुए कहा, ‘बेरहमी से गायों के मुंह, पेट और पैर काटे, फिर 277 किलो मांस निकालकर बेचने की तैयारी में थे। अगर सजा नहीं दी गई, तो समय के साथ धरती से गोमाता खत्म हो जाएंगी।’
आखिर पूरा मामला क्या है, किस कानून के तहत सजा हुई और मनुस्मृति जैसे ग्रंथों में गाय को लेकर क्या कहा गया है; आज के एक्सप्लेनर में…
सवाल-1: गोहत्या पर उम्रकैद का पूरा मामला क्या है?
जवाब: गुजरात के गांधीनगर में एक गांव है- जामला। 22 अगस्त 2024 को यहां एक घर में पुलिस ने छापा मारा और 6 लोगों को गिरफ्तार किया।
सरकारी वकील ने आरोपियों के खिलाफ दलील में कहा कि घर से पुलिस ने 277 किलो गोमांस (बीफ), गायों को काटने में इस्तेमाल होने वाले हथियार और मांस ले जाने वाली एक गाड़ी बरामद की।
वकील ने कहा कि वसीम कुरैशी और मोहम्मद रफीक कुरैशी कमजोर या दूध न देने वाली गायें और भैंसें खरीदते थे। उसके बाद वो अहमदाबाद से चार लोगों को बुलाते और जानवरों को बेरहमी से काट देते थे। गुलाम मोईन नाम का एक व्यक्ति इन लोगों से मांस खरीदता था।
पुलिस ने 6 लोगों पर गोहत्या और प्रतिबंधित मांस रखने, ट्रांसपोर्ट करने और बेचने का मुकदमा दर्ज किया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 54 गवाह और 18 कागजी सबूत पेश किए।
सुनवाई के बाद गांधीनगर की एडिशनल सेशंस कोर्ट ने वसीम कुरैशी, मोहम्मद रफीक कुरैशी और असफाक बहेलिम को दोषी करार दिया। 26 अक्टूबर 2026 को जज बीआर राजपूत ने तीनों को उम्रकैद की सजा सुनाई और 3-3 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया।

पुलिस हिरासत में वसीम कुरैशी, मोहम्मद रफीक कुरैशी और असफाक बहेलिम।
सवाल-2: कोर्ट ने मनुस्मृति और वेदों का जिक्र करते हुए क्या कहा?
जवाब: जस्टिस राजपूत ने गाय का धार्मिक महत्त्व बताने के लिए मनुस्मृति और वेदों का हवाला दिया…
मनुस्मृति में गाय को केवल जानवर नहीं, बल्कि खुशहाली, समाज और ‘धर्म’ का एक स्तंभ माना गया है। ऋषि-मुनियों ने जानवरों की सुरक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी वैश्य वर्ग को दी थी। इसके आर्ष विवाह (वैदिक परंपरा में शादी का एक तरीका) में गाय और बैल की जोड़ी का एक खास महत्त्व है।
गाय को ‘दुनिया की मां’ माना जाता है, जिसमें 33 करोड़ देवी-देवता निवास करते हैं। उसके चार पैर चार वेदों के प्रतीक हैं।
जब तपस्या की शक्ति से ‘अमृत’ की बूंदें धरती पर गिरीं, तो दिव्य गाय कामधेनु पैदा हुई और उसे धरती पर सभी गायों की पूर्वज माना जाने लगा। ऋग्वेद में गाय को अघ्न्या कहा गया है, यानी जिसे नहीं मारा जाना चाहिए।
कोर्ट ने फैसले में संस्कृत का एक श्लोक भी सुनाया-
त्वं माता सर्वदेवानां त्वं च यज्ञस्य कारणम्। त्वं तीर्थं सर्वतीर्थानां नमस्तेऽस्तु सदानघे॥
इसका हिंदी अर्थ है- ‘आप सभी देवताओं की माता हैं और आप सभी पवित्र यज्ञों का कारण हैं। आप सभी पवित्र जल और तीर्थस्थलों में सबसे पवित्र हैं। हम आपको सदा नमस्कार करते हैं।’
सवाल-3: कोर्ट ने किस कानून के आधार पर उम्रकैद की सजा सुनाई?
जवाब: गोहत्या पर उम्रकैद तक की सजा देने वाला गुजरात देश का पहला राज्य है।
2011 में गुजरात के तब के सीएम नरेंद्र मोदी की सरकार ने राज्य के एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट में बदलाव करके गायों की हत्या, उनके ट्रांसपोर्टेशन और गोमांस की बिक्री पर पूरी तरह बैन लगा दिया था।
इसमें गोहत्या करने पर 3 से 7 साल तक की सजा और 50 हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान था। जबकि गोमांस लाने-ले जाने, स्टोर करने या बिक्री करने पर अधिकतम 3 साल की सजा और 25 हजार जुर्माना था।
फिर गुजरात सरकार ने 2017 में एक्ट में संशोधन करके सजा बढ़ा दी। अब…
- गोहत्या पर 10 साल जेल से उम्रकैद तक और कम से कम 1 लाख से 5 लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान है।
- गोमांस लाने-ले जाने, स्टोर करने या बिक्री करने पर 7 साल से 10 साल तक जेल और 1 लाख से 5 लाख रुपए तक जुर्माने का प्रावधान है।
इससे पहले भी नवंबर 2025 अहमदाबाद की एक कोर्ट एक ही परिवार के 3 लोग- कासिम सोलंकी, सत्तार और अकरम को गोहत्या का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुना चुकी है।
सवाल-4: मनुस्मृति और वेदों में गोमांस खाने को लेकर क्या कहा गया है?
जवाब: गोवंश की हत्या और उसे खाने को लेकर विचारकों, स्मृतियों और इतिहासकारों के मत आपस में उलझे हुए हैं। वैदिक काल से अब तक इसे 3 फेज में बांटा जा सकता है…
फेज-1: वैदिक से मौर्यकाल (1500 से 200 ईसा पूर्व), पशु बलि की परंपरा
दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर रहे डीएन झा ने अपनी किताब ‘द मिथ ऑफ द होली काऊ’ में लिखा था, ‘ऋग्वेद जैसे ग्रंथों से पता चलता है कि वैदिक भारत में जानवरों का मांस खाना आम बात थी। वैदिक काल के ग्रंथों में गोहत्या का बहुत जिक्र है। उस समय के धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान पशुओं की बलि के बाद मांस खाने की परंपरा थी।’
इस दौर में गोमांस खाने के स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण तो नहीं मिलते, लेकिन डीएन झा के मुताबिक इसमें कोई शक नहीं है कि खाने और बलि के लिए जानवरों को बिना सोचे-समझे मारना वैदिक काल और बहुत बाद मौर्य काल तक जारी रहा।
फेज-2: मौर्य काल से शुरुआती मध्यकाल (200 ईसा पूर्व से 1000 ईस्वी तक), गोहत्या को लेकर साफ नियम नहीं
इसी दौर में अस्तित्व में आई मनुस्मृति। इसके श्लोक हिंदुओं को धर्म और उनके कर्तव्यों के बारे में बताते हैं। मनुस्मृति में कुछ जानवरों के मांस को खाने योग्य बताया गया है। हालांकि खाने लायक और न खाने लायक जानवरों की लिस्ट में गाय का साफ जिक्र नहीं मिलता।
माइथोलॉजिस्ट देवदत्त पटनायक लिखते हैं, ‘मनुस्मृति के अध्याय 5 में खाने-पीने की चीजों की लिस्ट है। श्लोक 5.18 में उन 5 नाखूनों वाले जानवरों का जिक्र है जिन्हें ‘द्विज’, यानी ऊंची जातियों के लोग खा सकते हैं- साही, हेजहोग, गोह, गैंडा, कछुआ और खरगोश। इसी श्लोक में ऊंट को छोड़कर उन जानवरों को खाने की भी अनुमति दी गई है, जिनके केवल एक जबड़े में दांत होते हैं। जैसे- गाय, बकरी और भेड़ के ऊपरी जबड़े में सामने के दांत नहीं होते। गाय के भी एक ही जबड़े में दांत होते हैं।’
हालांकि मनुस्मृति के अध्याय 11 में गोहत्या को ‘उपपातक’, यानी छोटे पापों की कैटेगरी में रखा गया है। इसे व्यभिचार और माता-पिता की उपेक्षा करने जैसे पापों के बराबर माना गया है। मनुस्मृति में ये भी कहा गया है कि गाय को मारने से जाति का नाश हो जाएगा। हालांकि यह किसी ब्राह्मण की हत्या करने जैसा ‘महापातक’, यानी बड़ा पाप नहीं है।
हालांकि इसी फेज में 9वीं शताब्दी के टीकाकार मेधातिथि ने मनुस्मृति की व्याख्या करते हुए कहा कि गोमांस खाना वैदिक परंपरा के मुताबिक है।
याज्ञवल्क्य स्मृति के रचयिता याज्ञवल्क्य ने लगभग 100-300 ईस्वी में कहा कि विद्वान ब्राह्मण का स्वागत बड़ा बैल, बकरा, स्वादिष्ट भोजन और मीठे शब्दों से करना चाहिए।

गाय और उसके बछड़े की यह मूर्ति 7वीं सदी के उत्तर प्रदेश की है। इसे लॉस एंजिल्स काउंटी म्यूजियम ऑफ आर्ट में रखा गया है।
9वीं शताब्दी में विश्वरूप और 12वीं शताब्दी में लक्ष्मीधर जैसे टीकाकारों ने भी अतिथि सत्कार में बैल के वध का समर्थन किया।
फेज-3: मध्यकाल और उसके बाद (1000 ईस्वी के बाद), पशुपालन पर जोर, गोहत्या का विरोध बढ़ता गया
इतिहासकार डीएन झा के मुताबिक, मौर्यकाल के बाद ब्राह्मणों को जमीन और गायें दान में मिलने लगीं। पशुपालन जरूरी हो गया और गाय मारने का विरोध शुरू हुआ।
महाभारत और पुराणों में भी गाय दान करने की बात जोर-शोर से कही गई। गो-सहस्रदान, यानी एक हजार गायों के दान को बड़े धार्मिक दानों में गिना गया है।
इसी दौरान कलियुग का कॉन्सेप्ट मजबूत हुआ। महाभारत और पुराणों में भी इसका जिक्र है। कलियुग में पुरानी प्रथाओं और पापों को छोड़ने को कहा गया। इन प्रथाओं को कलिवर्ज्य कहा गया। इसमें गोहत्या भी शामिल थी।
इस दौर की कई स्मृतियों और धर्मशास्त्रों में गोहत्या का विरोध किया गया। ऋषि पाराशर और देवल की स्मृतियों में गाय मारने वाले को अछूत बताया गया और कड़े प्रायश्चित की बात कही गई।
12वीं शताब्दी और उसके बाद के मध्यकालीन टीकाकार- अपरार्क, रघुनंदन, नीलकंठ, मित्र मिश्र वगैरह ने कहा कि कलियुग में गाय नहीं मारनी चाहिए।
फिर मुगल काल में अकबर और जहांगीर ने जैन लोगों के प्रभाव से जानवरों, खासकर गाय की हत्या पर रोक लगाने के आदेश दिए।
डीएन झा के मुताबिक, गाय ब्राह्मणवादी वर्ग में एक इमोशनल कल्चरल सिंबल के तौर पर उभर रही थी। 17वीं शताब्दी में मराठा शासक शिवाजी गाय और ब्राह्मणों के रक्षक के तौर पर उभरे। फिर 19वीं शताब्दी में सिख कूका (नामधारी) आंदोलन के नेता राम सिंह ने गोहत्या की इजाजत देने वाले अंग्रेजों के खिलाफ हिंदुओं और सिखों को अंग्रेजों के खिलाफ इकट्ठा किया।

गाय पर देवी-देवता के चित्र बना यह पोस्टर 1885 में कोलकाता बनाया गया था। इसके आस-पास सभी धर्म के लोग हैं और भारत माता गाय का दूध निकाल रही हैं। अंग्रेजों के शासन में इसे राष्ट्रवाद के प्रतीक की तौर पर इस्तेमाल किया जाता था।
1882 में आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती ने गोरक्षिणी सभा शुरू की। इसी दौरान गोहत्या को लेकर हिंदू-मुस्लिम तनाव भी बढ़ा। आजादी के बाद धीरे-धीरे गोहत्या को लेकर नियम बनाए जाने लगे।
सवाल-5: अभी पूरे देश में गोहत्या को लेकर क्या कानून है?
जवाब: गोहत्या से संबंधित मामलों पर कोई केंद्रीय कानून नहीं है। यह मामले राज्य सरकारों के कंट्रोल में आते हैं। सभी राज्यों के अलग नियम हैं, जिन्हें 3 कैटेगरी में समझ सकते हैं… प्रतिबंधित: गुजरात के अलावा महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, झारखंड, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और लद्दाख में गोहत्या बैन है। इन राज्यों में 1 से 10 साल की जेल और 10,000 से 5 लाख रुपए का जुर्माने का प्रावधान है। गुजरात से लगे दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव में भी गोहत्या पर उम्रकैद की सजा हो सकती है।
आंशिक प्रतिबंध: असम में बिना सर्टिफिकेट मवेशियों को मारने या मंदिर और नॉन-बीफ इलाकों में बेचने पर 3 से 8 साल की सजा और 5 लाख रुपए तक जुर्माना लग सकता है। ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी बिना सर्टिफिकेट मवेशियों को मारना मना है।
बिहार में गाय और बछड़े को मारना बैन है। 25 साल से ज्यादा उम्र, खेती और प्रजनन के लिए अयोग्य बैल और मादा भैंस को भी मार सकते हैं। तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, गोवा, पुड्डुचेरी, अंडमान एंड निकोबार आइलैंड में भी आंशिक प्रतिबंध है।
कोई प्रतिबंध नहीं: केरलम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम, लक्षद्वीप और मणिपुर में गोहत्या के लिए कोई अलग से कानून नहीं है।








