
नैनवां के शांति वीर धर्मस्थल जिनालय में शुक्रवार को आर्यिका संस्कृति श्री माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए आत्मसंयम, आत्मनियंत्रण और गुरु भक्ति के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य को सच्ची शांति तभी प्राप्त हो सकती है, जब वह अपनी आत्मा का सही संचालन करना सीख जाए। आज इंसान स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख पा रहा है, जिसके कारण जीवन में दुख और अशांति बढ़ती जा रही है।
संयम रूपी ब्रेक से मिलेगी जीवन को सही दिशा
आर्यिका संस्कृति श्री माताजी ने जीवन की तुलना बिना ब्रेक वाली गाड़ी से करते हुए कहा कि जिस प्रकार ब्रेक के बिना गाड़ी को नियंत्रित करना मुश्किल होता है, उसी प्रकार संयम के अभाव में मनुष्य का जीवन भी दिशाहीन हो सकता है। जब तक व्यक्ति अपने जीवन में संयम रूपी ब्रेक नहीं लगाएगा, तब तक वह सही दिशा में आगे नहीं बढ़ पाएगा।
उन्होंने कहा कि आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण आध्यात्मिक उन्नति के प्रमुख मार्ग हैं। मनुष्य को अपनी इच्छाओं और विचारों पर नियंत्रण रखते हुए जीवन में शांति, संतुलन और सदाचार को अपनाना चाहिए।
गुरु की छत्रछाया से आत्मा को मिलती है शांति
माताजी ने गुरु भक्ति के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि गुरु का मार्गदर्शन और उनकी छत्रछाया आत्मा को शांति प्रदान करती है। गुरु के बताए मार्ग पर चलकर व्यक्ति अपने जीवन को सही दिशा दे सकता है और आध्यात्मिक प्रगति की ओर अग्रसर हो सकता है।
उन्होंने आचार्य विभव सागर महाराज की रचना ‘तेरी छत्रछाया’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह रचना श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक प्रेरणा प्रदान करती है तथा गुरु के प्रति श्रद्धा और समर्पण का भाव जागृत करती है।
मंगलाचरण के साथ धर्मसभा का शुभारंभ
जैन समाज के प्रवक्ता महावीर सरावगी ने बताया कि धर्मसभा में मुनि भक्त शांतिलाल जैन, आवा वाले ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। धर्मसभा में आत्मकल्याण, संयम, गुरु भक्ति और आध्यात्मिक जीवन के महत्व से जुड़े संदेश दिए गए।
धर्मसभा के माध्यम से श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन करने, अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखने और गुरु के मार्गदर्शन में जीवन को शांति एवं सदाचार की दिशा में आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिली।








